दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास पर गंभीरता से काम करने की जरूरत: बृजमोहन अग्रवाल

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सांसद बोले— दिव्यांगजनों को सहानुभूति नहीं, सहयोग और प्रोत्साहन चाहिए; समय पर स्क्रीनिंग और समावेशी शिक्षा पर दिया जोर

रायपुर | 4 जुलाई 2026 | भारत36नेशनल

छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद द्वारा दिव्यांग बच्चों के विकास, शिक्षा, अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से शनिवार को रायपुर स्थित विमतारा भवन में एक दिवसीय राज्य स्तरीय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में नीति निर्माण, समावेशी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, समय पर पहचान (स्क्रीनिंग) और पुनर्वास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों ने विस्तार से अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद के अध्यक्ष एवं रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल रहे। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के अधिकारी, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, अभिभावक तथा दिव्यांग बच्चों के हित में कार्य करने वाले संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।


दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास को प्राथमिकता देने की जरूरत

अपने संबोधन में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास के क्षेत्र में गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं, बल्कि ऐसे ठोस सुझाव तैयार करना है जिनके माध्यम से दिव्यांग बच्चों को बेहतर शिक्षा, प्रशिक्षण और आत्मनिर्भर बनने के अवसर उपलब्ध कराए जा सकें।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक दिव्यांग बच्चे में कोई न कोई विशेष क्षमता होती है, जिसे पहचानकर विकसित करने की आवश्यकता है। समाज का दायित्व केवल सहानुभूति व्यक्त करना नहीं बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए सहयोग और प्रोत्साहन देना है।


‘विकलांग’ नहीं, ‘दिव्यांग’ शब्द सोच में बदलाव का प्रतीक

बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विकलांग” की जगह “दिव्यांग” शब्द का प्रयोग केवल शब्द परिवर्तन नहीं बल्कि समाज की सोच बदलने का प्रयास है। इसका संदेश यही है कि जिन बच्चों के शरीर में किसी प्रकार की कमी होती है, उनमें ईश्वर ने कोई विशेष प्रतिभा भी दी होती है।

उन्होंने कहा कि यदि इन विशेष क्षमताओं को समय रहते पहचाना जाए और उन्हें सही दिशा मिले तो दिव्यांग बच्चे समाज के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।


कम खर्च में उपचार और पुनर्वास उपलब्ध करा रहा बाल कल्याण परिषद

सांसद ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद का केंद्र मध्य भारत का महत्वपूर्ण संस्थान बन चुका है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के दिव्यांग बच्चों को बेहद कम शुल्क में उपचार, प्रशिक्षण और पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

उन्होंने बताया कि जिन सेवाओं के लिए निजी अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, वही सुविधाएं परिषद द्वारा अत्यंत कम लागत पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने समाज और शासन से इस संस्था को अधिक सहयोग देने की अपील भी की।


छत्तीसगढ़ में विशेष शिक्षा व्यवस्था बढ़ाने की आवश्यकता

बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि प्रदेश में आज भी दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल और विशेष रूप से उच्च शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यदि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समान अवसर दिए जाएं तो इससे केवल उनका ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का जीवन बदल सकता है।

उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें दिव्यांग बच्चों के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना अभी भी आवश्यक है।

उन्होंने सुझाव दिया कि—

  • सर्व शिक्षा अभियान की राशि का निश्चित हिस्सा दिव्यांग बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाए।
  • प्रत्येक विद्यालय में समावेशी शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
  • प्रदेश में विशेष शिक्षकों (Special Educators) की नियुक्ति बढ़ाई जाए।
  • बाल कल्याण परिषद सहित सभी संस्थाएं सरकार के समक्ष ठोस सुझाव प्रस्तुत करें।

दो वर्ष से पहले हो बच्चों की स्क्रीनिंग

सांसद ने नवजात एवं छोटे बच्चों की समय पर स्वास्थ्य जांच (स्क्रीनिंग) पर विशेष बल देते हुए कहा कि अक्सर माता-पिता को तीन या चार वर्ष बाद पता चलता है कि बच्चा सुन नहीं पा रहा, बोल नहीं पा रहा अथवा किसी अन्य प्रकार की दिव्यांगता से प्रभावित है।

उन्होंने कहा कि यदि आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से दो वर्ष की आयु से पहले नियमित स्क्रीनिंग की जाए तो समय रहते उपचार संभव है और कई प्रकार की दिव्यांगताओं के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उन्होंने जिला अस्पतालों में—

  • आधुनिक स्क्रीनिंग उपकरण,
  • प्रशिक्षित मानव संसाधन,
  • प्रभावी रेफरल सिस्टम,
  • तथा पुनर्वास सेवाओं

की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई।


विशेषज्ञों ने रखे महत्वपूर्ण सुझाव

परिषद के महासचिव चंद्रेश शाह ने बताया कि सेमिनार का उद्देश्य दिव्यांग बच्चों के अधिकारों, समावेशी शिक्षा, पुनर्वास और उनके समग्र विकास के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत दिव्यांग बच्चों के लिए निर्धारित अवसरों और योजनाओं पर विस्तृत चर्चा की गई।


‘गर्व स्पर्शी नहीं, मर्म स्पर्शी कार्य करना होगा’ : डॉ. वर्णिका शर्मा

छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने कहा कि समाज को केवल दिखावटी संवेदनशीलता नहीं बल्कि वास्तविक सेवा भाव अपनाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि दिव्यांग बच्चे “दिव्यपुष्प” हैं और उनका संरक्षण एवं विकास पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हमें “मेरा बच्चा” और “दूसरे का बच्चा” जैसी सोच से ऊपर उठकर प्रत्येक बच्चे को अपना मानना चाहिए।


गर्भावस्था और जन्म के बाद समय पर जांच जरूरी

विशेषज्ञ डॉ. कमल वर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम जैसी कई स्थितियों की पहचान गर्भावस्था के दौरान जांच के माध्यम से संभव है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण कई मामलों की समय पर पहचान नहीं हो पाती।

उन्होंने सुझाव दिया कि—

  • मितानिनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं की जांच बढ़ाई जाए।
  • जन्म के बाद छह माह के भीतर बच्चों की संभावित दिव्यांगता की स्क्रीनिंग अनिवार्य की जाए।

विशेषज्ञों ने माना कि समय पर पहचान, उचित उपचार और पुनर्वास सेवाओं के माध्यम से दिव्यांग बच्चों के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।


इन विशेषज्ञों ने भी साझा किए विचार

सेमिनार में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भाग लेकर दिव्यांग बच्चों के विकास, शिक्षा और अधिकारों पर अपने विचार रखे। इनमें शामिल रहे—

  • डॉ. आलोक उपाध्याय (इग्नू)
  • योगेंद्र पांडे (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय)
  • सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी सज्जाद नकवी
  • डॉ. वर्णिका शर्मा
  • सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता सुगंधा जैन
  • डाइटिशियन डॉ. सारिका श्रीवास्तव

सभी विशेषज्ञों ने समावेशी शिक्षा, समय पर पहचान, परिवारों की जागरूकता और प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था को दिव्यांग बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी बताया।


भारत36नेशनल निष्कर्ष

रायपुर में आयोजित यह राज्य स्तरीय सेमिनार केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दिव्यांग बच्चों के अधिकार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच और प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि यदि समय पर पहचान, समावेशी शिक्षा और समाज का सहयोग सुनिश्चित किया जाए तो दिव्यांग बच्चे भी अपनी प्रतिभा के बल पर समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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