Navratri 2026: कांतारा की तर्ज पर सजा मां दुर्गा का दरबार, बांस से जीवंत हुई बस्तर की संस्कृति

जगदलपुर के संतोषी वार्ड में आकर्षण का केंद्र बना अनूठा दुर्गा पंडाल, 90 प्रतिशत निर्माण बांस से; पंजुरली देव और बस्तर के स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराओं को दिया गया खास रूप

जगदलपुर, छत्तीसगढ़। शारदीय नवरात्रि 2026 के अवसर पर बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर में मां दुर्गा की भक्ति के साथ स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। शहर के संतोषी वार्ड में तैयार किया गया मां दुर्गा का विशेष पंडाल इन दिनों श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दक्षिण भारतीय फिल्म कांतारा की थीम से प्रेरित इस पंडाल में बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्रकृति के प्रति आस्था और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताओं को खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है।

इस पंडाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में लगभग 90 प्रतिशत बांस का इस्तेमाल किया गया है। पारंपरिक सामग्री और स्थानीय संस्कृति से प्रेरित कलाकारी के माध्यम से तैयार यह संरचना न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि बस्तर की विशिष्ट पहचान को भी सामने लाती है। मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहुंच रहे श्रद्धालु पंडाल की अनूठी बनावट और आकर्षक सजावट को देखने के लिए भी उत्साहित हैं।

28 वर्षों से अनूठी थीम पर पंडाल बना रही समिति

संतोषी वार्ड की नवयुवक श्री दुर्गा उत्सव समिति पिछले 28 वर्षों से नवरात्रि के अवसर पर हर साल अलग-अलग थीम पर दुर्गा पंडाल तैयार करती आ रही है। समिति का प्रयास रहता है कि प्रत्येक वर्ष श्रद्धालुओं को कुछ नया देखने को मिले और धार्मिक आयोजन के माध्यम से समाज को एक विशेष संदेश भी दिया जा सके।

इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समिति ने इस वर्ष कांतारा की थीम को बस्तर की स्थानीय संस्कृति के साथ जोड़ने का निर्णय लिया। फिल्म में प्रकृति, लोकविश्वास और पारंपरिक आस्था से जुड़े पहलुओं को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, उसी से प्रेरणा लेते हुए पंडाल को बस्तर की सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप आकार दिया गया है।

पंडाल में पंजुरली देव और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताओं को विशेष रूप से दर्शाया गया है। बांस से तैयार की गई आकर्षक संरचना के माध्यम से बस्तर की पारंपरिक आस्था और प्रकृति के साथ लोगों के गहरे संबंध को प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है।

बांस से तैयार हुई आकर्षक संरचना, पर्यावरण से जुड़ा संदेश

आमतौर पर दुर्गा पंडालों के निर्माण में प्लाईवुड और विभिन्न प्रकार की सजावटी सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन संतोषी वार्ड के इस पंडाल में बांस को प्रमुखता दी गई है। समिति के सदस्यों के अनुसार, शुरुआत में पंडाल निर्माण के लिए अलग-अलग विकल्पों पर विचार किया गया था। बाद में बस्तर की प्राकृतिक पहचान और पारंपरिक शिल्प से जुड़ी सामग्री को प्राथमिकता देते हुए बांस से पंडाल तैयार करने का फैसला लिया गया।

इस निर्णय ने पंडाल को एक अलग पहचान दी है। बांस की मदद से तैयार की गई संरचना में पारंपरिक कलात्मकता और आधुनिक थीम का मेल देखने को मिल रहा है। पंडाल के निर्माण और सजावट में पश्चिम बंगाल के कारीगरों ने अपनी कला का योगदान दिया है।

समिति के अनुसार, अब तक इसके निर्माण में लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं और सजावट का काम भी जारी है। पंडाल तैयार होते ही यहां श्रद्धालुओं और शहरवासियों की आवाजाही बढ़ने लगी। इसकी अनूठी बनावट के कारण लोग मां दुर्गा के दर्शन के साथ-साथ निर्माण शैली और कलाकारी को करीब से देखने पहुंच रहे हैं।

सोशल मीडिया पर भी बढ़ रही पंडाल की लोकप्रियता

संतोषी वार्ड का यह दुर्गा पंडाल धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। पंडाल की विशेष सजावट और कांतारा से प्रेरित थीम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। सोशल मीडिया पर रील बनाने वाले कंटेंट क्रिएटर और यूट्यूबर भी यहां आकर इसकी तस्वीरें और वीडियो साझा कर रहे हैं।

इससे पंडाल को शहर के बाहर भी पहचान मिलने की संभावना बढ़ी है। समिति को उम्मीद है कि इस वर्ष श्रद्धालुओं की भागीदारी पिछले वर्षों की तुलना में अधिक रहेगी। खास बात यह है कि धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति को जोड़ने की यह पहल युवाओं और नई पीढ़ी के बीच भी आकर्षण पैदा कर रही है।

बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल

बस्तर की संस्कृति प्रकृति, जमीन, लोकविश्वास और स्थानीय देवी-देवताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। यहां की परंपराएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बस्तर दशहरा इस विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसकी अपनी अलग परंपराएं और ऐतिहासिक पहचान है।

ऐसे में कांतारा जैसी लोकप्रिय फिल्म से प्रेरणा लेकर बस्तर की स्थानीय परंपराओं को दुर्गा पंडाल के माध्यम से प्रस्तुत करना समिति की एक विशेष पहल है। इसका उद्देश्य केवल आकर्षक सजावट करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारंपरिक मान्यताओं और स्थानीय विरासत के प्रति जागरूक करना भी है।

समिति का मानना है कि जब धार्मिक आयोजनों के साथ क्षेत्रीय कला, संस्कृति और परंपराओं को जोड़ा जाता है, तो लोगों को अपनी पहचान को समझने और उसे आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है।

श्रद्धालुओं से सभी दुर्गा पंडालों में पहुंचने की अपील

नवयुवक श्री दुर्गा उत्सव समिति ने श्रद्धालुओं और शहरवासियों से अपील की है कि वे नवरात्रि के दौरान केवल एक पंडाल तक सीमित न रहें, बल्कि जगदलपुर के विभिन्न दुर्गा पंडालों में पहुंचकर समितियों की मेहनत, रचनात्मकता और उत्साह का सम्मान करें।

संतोषी वार्ड का यह पंडाल इस बात का उदाहरण बनकर सामने आया है कि धार्मिक उत्सवों को स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक कला से जोड़कर उन्हें और अधिक अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है। मां दुर्गा की आराधना के बीच बांस से सजी यह अनूठी संरचना श्रद्धालुओं को बस्तर की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का प्रयास कर रही है।

नवरात्रि 2026 में जगदलपुर का संतोषी वार्ड मां दुर्गा की भक्ति, बस्तर की लोकसंस्कृति और पारंपरिक कलाकारी के इस अनूठे संगम के कारण विशेष चर्चा में है।


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